नदी कछार एवं तटों पर सब्जी उत्पादन: Shasyadhara Agriculture

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Diara farming

परिचय:

नदी कछारों एवं तटों पर सब्जियों का उत्पादन तटों पर बसे कृषकों का एक बहु प्रचलित और पुराना तरीका है, जो कई वर्षों से लघु कृषकों के द्वारा अपनाई जा रही है।

कछार क्या है?

कछार नदी का वह भाग होता है जहाँ तक बाँड़ के समय नदी का पानी भर जाता है। इस तरह इन भागों में बाँड़ के पानी उतरने के पश्चात विभिन्न पदार्थों की एक परत बन जाती है। साथ ही गर्मी के मौसम में नदी के सुखने से जो अतिरिक्त जल रहित स्थल बन जाते हैं वे भी कछार में शामिल हो जाते हैं। कछार नदी का सबसे उपजाऊ भाग होता है।

तट क्या है?

कछार का अंतिम सीमा ही नदी तट का प्रारंभ होता है, जिसमें बसे हुए गांव एवं कृषकों के खेत शामिल होते हैं। कछार के बाद तटीय भाग ही ज्यादा उर्वर होते हैं।

नदी कछार एवं तट ऐसे कृषि भूमि हैं जिनमें लगे फसल वर्ष भर पूर्ण सिंचाई की अवस्था में होते हैं।

उत्पत्ति

खेती की उत्पत्ति ही नदी के तटों से मानी जाती है जो कि हड़प्पा और मोहेंजोदड़ो जैसी प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ी है। यह खेती की एक आधारभूत पद्धति है जो कई सदी से विद्यमान है।

क्रियाविधि:

जलवायु एवं मौसम

नदी तटों पर खेती साल भर की जा सकती है जबकि कछारों में खेती उन मौसमों में की जाती है जब उनमें जल भराव की स्थिति ना हो। अतः ठण्ड के मौसम से गर्मी के मौसम में जायद वर्गीय फसलों की खेती कछारों में की जाती है।

बड़ी नदियों के द्वारा अपने आसपास के जलवायु पर असर डाला जाता है। इस प्रकार से इन क्षेत्रों में एक सूक्ष्म जलवायु निर्मित हो जाती है। गर्मी के मौसम में आसपास का तापमान अन्य भागों की तुलना में कम होती है जो खड़ी फसलों के लिये लाभकारी होती है।

फसल का चयन

प्रति भू-भाग अधिक उत्पादन देने वाली नकदी फसलों का चयन करना चाहिये। फसलों की उन्हीं क़िस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिये जो कम अवधि वाले होते हैं। तटों पर खेती के लिये खरीफ़ एवं रबी वर्गीय फसल तथा कछारों पर जायद वर्गीय फसल लगाई जाती है।

स्थल की तैयारी

तटीय भाग की तैयारी सामान्य खेती की तरह की जाती है। नदी के किनारे एवं बीच के सूखे भागों में क्यारियों को सूखे गड्डे के रूप में बनाया जाता है। इन गड्डों की गहराई फसलों के जड़तंत्र के अनुरूप होती है। कम गहराई वाले पौधों के लिये क्यारियों की गहराई अधिक रखी जाती है। क्यारियों की गहराई वर्तमान में उपलब्ध नदी जलस्तर के कुछ उपर तक रखी जाती है जिससे पौधे के जड़ों तक नमीं की उपलब्धता बनी रहे।

तटीय स्थल की तैयारी

उर्वरक प्रबंधन

सामान्य भूमि की तुलना में कछार एवं तटीय भूमि में अधिक मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इन भागों में प्राकृतिक रूप से उर्वरता का प्रबंधन होता रहता है।

सामान्यतः मृदा के कुछ ऊपरी भाग ही उर्वर होते हैं। वर्षा के जल द्वारा इन्हीं परतों का अपरदन होने एवं साथ ही जल के द्वारा बहाकर लाये गये अवशिष्ट पदार्थों से नदी तट एवं कछार सालभर उर्वर बने रहते हैं। खेती के लिये बनाये गये क्यारियों में गोबर की खाद अथवा अन्य कार्बनिक खाद अवश्य मिलानी चाहिये।

सिंचाई तंत्र व्यवस्था

नदी जल को ऊपरी तटीय क्षेत्र में लाने के मोटर अथवा डीजल पंप की सहायता ली जाती है। सोलर पंप यूनिट की स्थापना से समय एवं ऊर्जा दोनों की बचत होती है। अन्य दशाओं में सिंचाई की पुरानी पद्धति को अपनाई जाती है।

1 एचपी मोटर पंप

फसल सुरक्षा

जिन फसलों को नदी के आंतरिक भाग में बोया जाता है उनमें रासायनिक पिडकनाशकों का प्रयोग नहीं करना चाहिये। इससे नदी के पर्यावरण तंत्र को नुकसान पहुंचता है। पीड़क नियंत्रण के लिये निम्न जैविक विधियों का उपयोग करना चाहिए:-

  1. लाइट ट्रैप।
  2. फेरोंमोन ट्रैप।
  3. मित्रकीट।

कुछ मात्रा में रासायनिक पिडकनाशकों का प्रयोग करने पर उन्ही रसायनों का प्रयोग करना चाहिए जो बायोडिग्रेडेबल होते हैं और जिनकी प्रतीक्षा अवधि कम से कम होती है।

उपज

परंपरागत भागों से प्रति एकड़ उत्पादन अधिक होती है जो कि फसलों के अनुसार अलग-अलग होती है।

सरकारी योजनायें

उद्यानिकी विभाग द्वारा नदी तटों एवं कछारों पर सब्जी उत्पादन को और ज्यादा प्रोत्साहन देने के लिये नदी तटों पर बसे गांव के लघु एवं मध्यम वर्गीय कृषकों को अनुदान पर उत्तम किस्म के बीज प्रदाय किये जाते हैं।

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1. Author and Content Writer. 2. Agriculture Consultant and Farmer's Trainer. 3. Agriculture Entrepreneur.

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