70 वर्ष के छोटे किसान और कृषि

Small holding farmers.

बैकग्राउंड:

26 जनवरी, 2019 के दिन हमारे देश के कुछ किसान 70 साल के होने जा रहे हैं। जिन्होंने अपनी जिंदगी के इन 70 सालों की यात्रा में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। मौसम की मार के साथ-साथ एकतरफा पक्षपात को भी सहा है। बहुत समय बीत गया पर ये किसान अभी तक छोटे से बड़े नहीं हो पाए हैं। ब्रिटिश काल में नील की खेती की गुलामी से लेकर जमींदारी प्रथा, हर समय और हर जगह देश की भूमि का हर एक टुकड़ा इनके खून और पसीने से सिंचित हुई है। आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से जानने की कोशिश करते हैं कि इस कृषि प्रधान देश में 70 साल पहले छोटे और मध्यमवर्गीय किसानों की स्थिति क्या थी और आज वर्तमान में क्या है?

अगर हम इतिहास में ब्रिटिश काल से थोड़ा फिछे जायें तो हमें पता चलता है कि उस समय भी किसानों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके उपज का एक बड़ा भाग लगान के रूप में चला जाता था जो ब्रिटिश काल में भी जारी रही। ये सब काफी पुरानी बातें हैं। अब हम उस वर्तमान स्थिति की चर्चा करते हैं जिसकी सुरुवात हमारी आजादी और गणतंत्रात्मक देश से होती है।

कृषि के क्षेत्र में एक के बाद एक कई सारी योजनाएं आईं। देश में मुख्य रूप से कृषि के क्षेत्र में विकास लाने के लिए सरकार द्वारा इसे पंचवर्षीय योजनाओं में कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों के साथ शामिल किया गया। हर योजना और उनके महत्वपूर्ण बिन्दुओं में कृषि और उससे जुड़े कृषकों की उन्नति की झलक थी। यहाँ सिर्फ जमीनी स्तर की योजनायें थीं जिनसे कृषकों का विकास संभव है।

पिछले 10 सालों में कृषि विज्ञान और तकनिकी के क्षेत्र में बहुत तेजी से विकास हुआ है। हाईटेक कृषि और एडवांस तकनिक की मदद से कृषि कर क्षेत्र ने बहुत उन्नति की है। नये-नये प्रयोग और खोजों से फसलों की नई प्रजातियों का विकास हुआ है प्रति हेक्टेयर उपज भी बढ़ी एवं फसलों के रोग प्रतिरोधक गुणों के कारण फसल क्षति की दर भी कम हुई।

निःसंदेह, दशकों बीत जाने के बाद कृषि के प्रत्येक क्षेत्र में खूब उन्नति हुई है, परन्तु आज हम शुरुवाती दिनों से लेकर आज तक देखते हैं कि कृषको, जिन्हें हम अन्नदाता भी कहते हैं, की दशा कल क्या थी? आज क्या है? और आने वाले दिनों में क्या हो सकता है।

हम सभी को पता है कि जमींदारी प्रथा के दौरान ज़मींदारों द्वारा छोटे किसानों की जमीनें गिरवी रख कर उनपर कब्जा कर लिया जाता था इस तरह किसान अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने के लिए मजबूर हो जाता था। जमीन अपनी, मजदूरी भी अपनी लेकिन तैयार फसल पर उनका कोई हक नहीं होता था।

आज जमीन भी अपनी, मेहनत भी अपनी तैयार फसल पर हक भी अपना। लघु से लेकर मध्यमवर्गीय कृषक, सभी कृषि की नई विधि और तकनिकी की सहायता से अपनी खेतों से अच्छी फसल प्राप्त कर रहे हैं। परंतु मुख्य समस्याएँ यहीं से शुरू होती हैं, जो निम्न. बिन्दुओं से संबंधित हैं:

  • उपज का उचित मूल्य न मिल पाना।
  • मेहनत का सही परिणाम न मिलना पाना।
  • लोगों में कृषकों एवं कृषि उत्पादों के प्रति मानसिकता।
  • कृषि उत्पादों को समुचित बढ़ावा न मिलना।
  • कृषि में उद्योगों का हस्तक्षेप।
  • कृषि से सम्बंधित योजनायें।
  • कृषकों से सम्बंधित समस्याएं।
  • कृषकों का हार मानना।
  • अन्य कारण।

लोगों को पता होना चाहिए कि हमारे देश में छोटे कृषकों को एक फसल तैयार करने में बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। खेत की तैयारी से लेकर फसल की कटाई और बिक्री करने की पूरी प्रक्रिया में अपनी पूर्व संचित धन का एक बहुत बड़ा हिस्सा लगा देता है। इनका विश्वास टिक होता है हालातों के सुधरने पर। और इन हालातों का सुधरना उपरोक्त विषयों के प्रति हमारे सोंच में बदलाव और सहयोग से संभव है। इनकी चर्चा हम प्रश्न और जवाबों के साथ करेंगे।

उपज का उचित मूल्य न मिल पाना:

जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि एक कृषि उत्पाद को तैयार करने और उसे बाजार तक लाने में किसान को अपनी पूँजी का एक अच्छा-खासा भाग निवेश करना पड़ता है। उपज की बिक्री के बाद उसके कुल आय की तुलना अगर हम कुल निवेशित पूँजी से करते हैं लाभ की मात्रा न के बराबर होती है। इस दयनीय स्थिति के कई कारण हैं जिनका कृषकों की वर्तमान स्थिति से कोई हमदर्दी नही है।

मेहनत का सही परिणाम न मिलना पाना:

आज किसान जो भी फसल या उत्पाद तैयार कर रहा है, अगर इनका पूरा मूल्य सीधे उसे ही मिले तो उसकी आर्थिक स्थिति सुधरते देर नहीं लगेगी। एक ओर कृषि उत्पादों की कीमत पूर्व नियोजित ढंग से पहले से ही कम होती है और दूसरी ओर इसके विपरीत बुरी बात यह होती है कि जितनी मेहनत एक किसान फसल तैयार करने में लगता है उतनी ही आसानी से एक बिचौलिया कम दामों में इन फसलों को किसानों से लेकर कम मेहनत में ज्यादा लाभ पाता है।

लोगों में कृषकों एवं कृषि उत्पादों के प्रति मानसिकता:

लोगों की मानसिकता भी कृषि उत्पादों की खरीदी को लेकर शुरू से ही अच्छी नहीं रही है। अगर हम अन्य क्षेत्रों के उत्पादों की बात करें, जैसे कि- कपड़े, दवाई, मशीनें आदि, तो हम देखते हैं कि एक ग्राहक इन उत्पादों को उन्ही दामों पर खरीदता है जो दुकानदार या व्यापारी तय करता है। या तो वह थोड़ा बहुत मोलभाव करता है या करता ही नही है। वे मैक्सिमम रिटेल प्राइस की परवाह भी नही करते, उसे देखते तक नहीं। पर बात जैसे ही कृषि उपज की आती है, वे मोलभाव करना चालू कर देते हैं और कम से कम कीमत पर ही इन चीजों को खरीदते हैं। इस तरह एक किसान को लाभ का मार्जिन बहुत ही काम मिलता है।

कृषिक उत्पादों को समुचित बढ़ावा न मिलना:

आज लगभग हर क्षेत्र के उत्पाद की एक उचित कीमत तय है। इसमें निर्माणकर्ता, मध्यस्थ तथा विक्रेता सभी के मुनाफे उचित अनुपात में शामिल होते हैं। जिसे हम अधिकतम खुदरा मूल्य के नाम से भी जानते हैं। कृषि उत्पादों के साथ ऐसा नहीं है। यहाँ किसानों को लाभ की तुलना में मेहनत ज्यादा होता है क्योंकि अधिकतम लाभ मध्यस्थों को हो जाता है। कृषि उत्पादों में कुछ ही गिने-चुने उपज को छोड़ दें तो बचे हुए अधिकांश उत्पादों की कोई तय कीमत नही है। धान और गेहूँ जैसे कुछ महत्वपूर्ण फसलों को समर्थन मूल्य प्राप्त हैं पर ये बहुत कम होते हैं जो कि छोटे किसानों की स्थिति सुधारने में कभी कारगार साबित नहीं होते हैं।

कृषि में उद्योगों का हस्तक्षेप:

हमारे देश में कृषि उपजों के प्रसंस्करण से सम्बंधित अनेक उद्योग हैं। ये किसानों से कच्चे माल को हमेशा कम मूल्य पर थोक में खरीदते हैं। इस तरह किसानों द्वारा उद्योगों को कच्चे कृषि उपजों को कम दामों में बेचने की एक प्रवृत्ति बन जाती है जो वर्ष दर वर्ष चलती रहती है।

कृषि से सम्बंधित योजनाएँ:

वर्तमान में कृषि के विकास के लिए अलग-अलग राज्यों में कई सारी योजनाएँ संचालित हैं। इनसे कृषि में कई सारे महत्वपूर्ण विकास हुए हैं पर लघु एवं सीमांत कृषकों की स्थिति शुरू से ही एक समान रही है। कहीं न कहीं उन जमीनी योजनाओं की कमी है जो कृषकों की स्तिथि को ऊँचा उठाने की दिशा में काम और इसका परिणाम आने वाले कुछ समय में हमें दिखे। इस तरह की योजनाएँ आज भी हैं पर वे उन कृषकों तक नहीं पहुँच जिनको इसकी जरूरत है। जरूरतमंद कृषकों तक ये योजनाएँ पहुँचे ऐसी मॉनिटरिंग की कमी है अन्यथा इनका कोई महत्व नहीं रह जाता।

कृषकों से सम्बंधित समस्याएँ:

कमी एक ही ओर से नही होती है। कुछ कमियाँ कृषकों में भी होती हैं। अपनी स्तिथि में यथासंभव सुधार कैसे लाना है ये उन्ही पर निर्भर करता है। समुचित ज्ञान का अभाव और सोंच में परिवर्तन की कमी एक कृषक को एक ही स्थिति में रोक कर रखने के लिए काफी है। साथ ही पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार में ज़मीन के बंटवारे से छोटे किसान और छोटे होते जा रहे हैं। यह उनकी स्थिति में गिरावट की एक और मुख्य वजह है।

हमें प्रयास करना चाहिए कि उपज हम खुद ही बेंचें और उन्हीं कीमतों पर जो हमने तय किये हों। बीच से मध्यस्थों को हटाना ही हमारी सफलता का पहला आयाम होगा।

कृषकों का हार मानना:

अंत में एक छोटे कृषक के जीवन में इतनी सारी समस्याएँ आ जाती हैं जिनका सामना वह नहीं कर पाता। वह हार मानने पर मजबूर हो जाता है। इसलिये वह जो कल था वही आज भी है।

अन्य कारण:

उपरोक्त वर्णित कारणों के अलावा कृषकों से सम्बंधित अन्य कई छोटी-छोटी समस्याएँ हो सकती हैं जिन्हें कृषकों को खुद पहचान कर उन्हें समझना होगा और अपने कर्तव्य में लगे रहना है।

इस विषय में हमारे 3 मुख्य प्रश्न थे 1. कृषकों की हालत कल क्या थी? 2. आज क्या है? 3. भविष्य में क्या हो सकता है?

इनका उत्तर देना हमारे लिए बहुत मुश्किल नही है। हमारे देश के छोटे कृषकों की हालात कल भी खराब थी, आज भी कोई सुधार नहीं है और भविष्य में सुधार की आशा हम कर सकते हैं। कृषकों को मानना और समझना होगा कि भविष्य में उनकी हालातों में सुधार होना और न होना स्वयं उनपर ही निर्भर है। इसके अलावा कोई और दूसरा रास्ता नहीं है।

हमारा पूरा देश कृषि पर आधारित है, इसकी अर्थव्यवस्था सीधे कृषि से जुड़ी है। हमारे जिंदगी और समाज में कृषकों के मेहनत का महत्व इसी बात से विदित हो जाती है कि किसान खुद चाहे कितनी बुरी स्थिति में क्यों न हो, उसके वर्तमान में सुधार हो या न हो अथवा उसे आगे भी सुधार की संभावना न दिखे तब भी वह सूखे खेत को अपने पसीने से सींच कर, हरी फसलें उगाने और देश के पालन पोषण करने के उत्तरदायित्व से कभी पीछे नहीं हटेगा।

-By Harish Manik

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1. Author and Content Writer. 2. Agriculture Consultant and Farmer's Trainer. 3. Agriculture Entrepreneur.

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adminDetective SocietyNaveen dhanwarJyoti123459 Recent comment authors
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Detective Society
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Detective Society

शस्यधरा…मशरूम के बारे में भी बताइये ।

Naveen dhanwar
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Naveen dhanwar

Nice article

Jyoti
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Jyoti

Nice information

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123459

Nice information

K.R. Sudama
Guest

Nice story about our farmer